जंगलों के बीच एक ऐसा पुस्तकालय, जो लोगों को कर रहा शिक्षित 

चाय बेचने वाले केरल पीवी छिन्नाथमबी और शिक्षक पीके मुरलीधरन ने मिलकर इदुक्की ज़िले के जंगलों के बीच बसे कस्बे एडमलक्कुडी में पुस्तकालय की नींव रखी। यहाँ के आदिवासी मुथुवान जाति के लोगों के लिए अपने आस-पास पुस्तकालय का होना किसी सपने से कम नहीं था।

जंगलों के बीच एक ऐसा पुस्तकालय, जो लोगों को कर रहा शिक्षित 

शहरों में पुस्तकालय होना कोई नयी बात नहीं है। लेकिन जब वो पुस्तकालय जंगलों के बीच कसबे में हो, तो अचरज की बात तो जरूर है। जी हाँ, ऐसा कर दिखाया है चाय बेचने वाले केरल पीवी छिन्नाथमबी और शिक्षक पीके मुरलीधरन ने। दोनों ने मिलकर इदुक्की ज़िले के जंगलों के बीच बसे कस्बे एडमलक्कुडी में पुस्तकालय की नींव रखी। यहाँ के आदिवासी मुथुवान जाति के लोगों के लिए अपने आस-पास पुस्तकालय का होना किसी सपने से कम नहीं था।

 

दोनों ने मिलकर अपनी छोटी-सी चाय की दुकान पर एक पुस्तकालय की स्थापना की। इस पुस्तकालय का नाम ‘अक्षर’ रखा गया। शुरूआती दौर में 160 पुस्तकों शामिल किया गया। शायद यह विश्व में पहला ऐसा पुस्तकालय होगा जो वन क्षेत्रों के बीचो बीच है जहाँ पुस्तकप्रेमी पैदल चलकर किताबें पढ़ने आते हैं।

इन दोनों ने दो दशक पूर्व ही पुस्तकालय के लिए एडमलक्कुडी में अपना घर बना लिया था, ताकि यहाँ के लोगों को शिक्षित कर सकें।

शिक्षक पीके मुरलीधरन कहते हैं, “मेरे एक मित्र उन्नी प्रसन्त तिरुअनंतपुरम में आकाशवाणी और रेडियो एफएम में काम करते हैं। 2009-2010 के बीच हमसे मिलने वह एडमलक्कुडी आए। वह छिन्नथंबी की झोपड़ी में रुके थे और तभी हमने यहाँ शिक्षा कि स्थिति और पढ़ने की आदतों पर चर्चा की। उसी समय पहली बार पुस्तकालय बनाने का विचार आया। इसके कुछ महीने बाद उन्नी अपने मित्र और केरला कौमुदी के उप-संपादक बी आर सुमेश के साथ 160 किताबें लेकर आए, जिन्हें इन्होंने खुद इकट्ठा किया था।

हालाँकि उनके पास उस वक़्त जगह का अभाव था इसलिए अपनी चाय की दुकान में ही पुस्तकालय खोल लिया। छिन्नथंबी की सोच सरल थी। लोग इनकी दुकान पर चाय और नाश्ते के लिए आते और या तो यहाँ किताब पढ़ते या कुछ समय के लिए पैसे दे कर किताबें ले जाते। जल्द ही यह पुस्तकालय लोकप्रिय हो गया और अधिक से अधिक लोग इस दुकान में न सिर्फ चाय पीने, बल्कि किताबें पढ़ने के लिए आने लगे।

धीरे-धीरे यहाँ एक रजिस्टर में पढ़ने के लिए दी गई पुस्तकों का रिकॉर्ड रखा जाने लगा। पुस्तकालय की सदस्यता एक बार 25 रुपए देकर या मासिक 2 रुपए दे कर ली जा सकती थी।

इस पुस्तकालय के बारे में दुनिया को तब मालूम हुआ जब पत्रकारों के एक समूह ने एडमलक्कुडी का दौरा किया।