माँ शैलपुत्री की साधना से दूर होती है मन विकृतियां

माँ शैलपुत्री की साधना का संबंध व्यक्ति के सुख, सुविधा, माता, निवास स्थान, पैतृक संपत्ति, वाहन सुख, और चल-अचल संपत्ति से है। जिनकी कुण्डली में चंदमा किसी नीच ग्रह से प्रताड़ित है या चंद्रमा नीच का है,उन्हें माँ शैलपुत्री की साधना सर्वश्रेष्ठ फल देती है। माँ शैलपुत्री की साधना से साधक की मनोविकृति दूर होती है। 

माँ शैलपुत्री की साधना से दूर होती है मन विकृतियां
Pic of Maa Shailputri
माँ शैलपुत्री की साधना से दूर होती है मन विकृतियां
माँ शैलपुत्री की साधना से दूर होती है मन विकृतियां
माँ शैलपुत्री की साधना से दूर होती है मन विकृतियां
माँ शैलपुत्री की साधना से दूर होती है मन विकृतियां

नवदुर्गा की उपासना का पर्व है नवरात्र

नवरात्र शक्ति की आराधना का पर्व है। नवरात्र में तीन वैदिक युग की देवियों पार्वती, लक्ष्मी और सरस्वती के नौ विभिन्न स्वरूपों की उपासना की जाती है। जिन्हें नवदुर्गा के नाम से जाना जाता है। पहले तीन दिन पार्वती के तीन स्वरूपों की..जबकि अगले तीन दिन लक्ष्मी माता के स्वरूपों और आखिरी के तीन दिन मां सरस्वती के स्वरूपों की पूजा-अर्चना का विधान है। नवरात्र की ये नौ देवियां हमारे संस्कार एवं आध्यात्मिक संस्कृति से जुड़ी हुई हैं। इन सभी देवियों को लाल रंग के वस्त्र, रोली,  लाल चंदन, सिंदूर,  आभूषण और खाने-पीने के भी वही सामान अर्पित किए जाते हैं,जिनका रंग लाल होता है।

घटस्थापना की विधि

नवरात्र के पहले दिन घटस्थापना का विधान है। सर्वप्रथम घटस्थापना यानी पूजा स्थल में तांबे या मिट्टी का कलश स्थापित किया जाता है, जो अगले नौ दिनों तक एक ही स्थान पर स्थित होता है। घटस्थापना के लिए गंगा जल, नारियल, लाल कपड़ा, मौली, रोली, चंदन, पान, सुपारी, धूपबत्ती, घी का दीपक, ताजे फल, फूल माला, बेलपत्रों की माला और एक थाली में अरवा चावल लें। घटस्थापना के स्थान में केले का खंबा, घर के दरवाजे पर बंदनवार के लिए आम के पत्ते, तांबे या मिट्टी का एक घड़ा, चंदन की लकड़ी, सयौंषघि, हल्दी की गांठ, पांच प्रकार के रत्न या आभूषण देवी को स्नान के बाद पहनाने के लिए रखें। इसके अलावा देवी की मूर्ति के अनुसार लाल कपड़े, मिठाई, सुगंधित तेल, सिंदूर, कंघा, दर्पण, आरती के लिए कपूर, पांच प्रकार के फल, पंचामृत, पंच गव्य रखना जरूरी है। घटस्थापना के लिए दुर्गा जी की सोने, चांदी या ताम्र मूर्ति उत्तम माना गया है। अगर उपलब्ध न हो तो मिट्टी की मूर्ति जरूर होनी चाहिए जिसको रंग आदि से चित्रित किया गया हो। 

प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री

वन्दे वांछित लाभाय चन्द्रा‌र्द्वकृतशेखराम्। वृषारूढ़ा शूलधरां यशस्विनीम्॥

अर्थात देवी वृषभ पर विराजित हैं। शैलपुत्री के दाहिने हाथ में त्रिशूल है और बाएं हाथ में कमल पुष्प सुशोभित है। यही नवदुर्गाओं में प्रथम दुर्गा हैं। नवरात्रि के प्रथम दिन देवी उपासना के अंतर्गत शैलपुत्री की पूजा की जाती है। मां शैलपुत्री का वर्ण चंद्र के समान है, इन्होंने अपने मस्तक पर स्वर्ण मुकुट धारण किया हुआ है। इनके मस्तक अर्धचंद्र अपनी शोभा बढ़ा रहा है। घोर तपस्या करने वाली शैलपुत्री समस्त वन्य जीव-जंतुओं की रक्षक भी हैं। शैलपुत्री के अधीन वे सभी भक्त आते हैं जो योग, साधना, तप और अनुष्ठान के लिए पर्वतराज हिमालय की शरण लेते हैं। पर्वतराज हिमालय के घर जन्म लेने के कारण इन्हें शैलपुत्री कहा गया। हिमालय की पुत्री होने से यह देवी प्रकृति स्वरूपा भी है। हिमालय हमारी शक्ति, दृढ़ता, आधार और स्थिरता का प्रतीक है। मां शैलपुत्री को अखंड सौभाग्य का प्रतीक भी माना जाता है। स्त्रियों के लिए उनकी पूजा करना ही श्रेष्ठ और मंगलकारी है। नवरात्रि के प्रथम दिन साधक अपनी शक्ति मूलाधार में स्थित करते हैं एवं योग साधना करते हैं। शैलपुत्री की आराधना करने से जीवन में स्थिरता आती है।

मां शैलपुत्री के शस्त्रों का अध्यात्मिक महत्व

नवरात्र में मां दुर्गा के नौ रूपों की उपासना विधि-विधान से की जा रही है। मां दुर्गा को सर्वप्रथम शैलपुत्री के रूप में पूजा जाता है। पर्वतराज हिमालय के पुत्री के रूप में जन्म लेने के कारण इनका नाम शैलपुत्री पड़ा। वृषभ पर सवार मां शैलपुत्री ने दाएं हाथ में त्रिशूल धारण कर रखा है, और इनके बाएं हाथ में कमल सुशोभित है। यही देवी प्रथम दुर्गा हैं और यही सती के नाम से भी जानी जाती हैं। अब यह जान लाना भी अति आवश्यक है कि मां शैलपुत्री के हाथों में सुशोभित त्रिशूल और कमल पुष्प का धार्मिक और अध्यात्मिक महत्व क्या है। दरअसल, यह त्रिशूल तीन शक्तियों का प्रतीक है। ये तीन शक्तियां ज्ञान, श्री और शक्ति हैं। ज्ञान यानि सरस्वती, श्री अर्थात् महालक्ष्मी और शक्ति का मतलब है मां कालिका। मां शैलपुत्री के हाथ में त्रिशूल होने का यही अर्थ है कि विद्या, धन और शक्ति तीनों इनके अधीन हैं। मां शैलपुत्री की भक्ति से यह तीनों शक्तियां प्राप्त हो जाती हैं। साथ ही महाशक्ति अपने भक्तों के शत्रुओं का नाश भी इसी त्रिशूल से करती हैं। यदि बात कमल पुष्प की करें तो धार्मिक कार्यों में कमल पुष्प का विशेष महत्व है। क्योंकि कमल के पुष्प को अत्यंत्र पवित्र, पूजनीय और सुंदर के अतिरिक्त सद्भावना, शांति, समृद्धि एवं बुराइयों से मुक्ति का प्रतीक माना गया है। कमल पुष्प ऐश्वर्य और सुख का सूचक भी है। यही कारण है कि पूजन आदि में कमल पुष्प का विशेष महत्व है। अनेक प्रकार के यज्ञों और अनुष्ठानों में कमल के पुष्पों को निश्चित संख्या में चढ़ाने का विधान शास्त्रों में भी वर्णित है।


मां शैलपुत्री की उपासना

नवरात्र के पहले दिन सर्वप्रथम एक चौकी पर माता शैलपुत्री की प्रतिमा या तस्वीर स्थापित करें। इसके बाद गंगा जल या गोमूत्र से शुद्धीकरण करें। चौकी पर चांदी, तांबे या मिट्टी के घड़े में जल भरकर उस पर नारियल रखकर कलश स्थापना करें। उसी चौकी पर श्रीगणेश, वरुण, नवग्रह, षोडश मातृका, सप्त घृत मातृका की स्थापना भी करें। इसके उपरांत व्रत, पूजन का संकल्प लें और वैदिक एवं सप्तशती मंत्रों द्वारा मां शैलपुत्री सहित समस्त स्थापित देवताओं की षोडशोपचार पूजा करें। इसमें आवाहन, आसन, पाद्य, अ‌र्घ्य, आचमन, स्नान, वस्त्र, सौभाग्य सूत्र, चंदन, रोली, हल्दी, सिंदूर, दुर्वा, बिल्वपत्र, आभूषण, पुष्प-हार, सुगंधित द्रव्य, धूप-दीप, नैवेद्य, फल, पान, दक्षिणा, आरती, प्रदक्षिणा और मंत्र पुष्पांजलि मां शैलपुत्री को अर्पित करें। मां शैलपुत्री की पूजा के समय इन मंत्रों का जाप करना बहुत फलदायक होता है।

शैलपुत्री का ध्यान

वन्दे वांछितलाभाय चन्द्रर्धकृत शेखराम्। 
वृशारूढ़ा शूलधरां शैलपुत्री यशस्वनीम्॥
पूणेन्दु निभां गौरी मूलाधार स्थितां प्रथम दुर्गा त्रिनेत्राम्।
पटाम्बर परिधानां रत्नाकिरीटा नामालंकार भूषिता॥
प्रफुल्ल वंदना पल्लवाधरां कातंकपोलां तुग कुचाम्।
कमनीयां लावण्यां स्नेमुखी क्षीणमध्यां नितम्बनीम्॥

मां शैलपुत्री की साधना के लिए साधक अपने मन को “मूलाधार चक्र” में स्थित करते हैं। इनको साधने से “मूलाधार चक्र” जागृत होता है और यहीं से योग चक्र आरंभ होता है जिससे अनेक प्रकार की सिद्धियों कि प्राप्ति होती है।

शैलपुत्री की स्तोत्र पाठ

प्रथम दुर्गा त्वंहिभवसागर: तारणीम्।
धन ऐश्वर्यदायिनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यम्॥
त्रिलोजननी त्वंहि परमानंद प्रदीयमान्।
सौभाग्यरोग्य दायनी शैलपुत्री प्रणमाभ्यहम्॥
चराचरेश्वरी त्वंहिमहामोह: विनाशिन।
मुक्तिभुक्ति दायनीं शैलपुत्री प्रमनाम्यहम्॥

शैलपुत्री की कवच

ओमकार: मेंशिर: पातुमूलाधार निवासिनी।
हींकार: पातु ललाटे बीजरूपा महेश्वरी॥
श्रींकारपातुवदने लावाण्या महेश्वरी ।
हुंकार पातु हदयं तारिणी शक्ति स्वघृत।
फट्कार पात सर्वागे सर्व सिद्धि फलप्रदा॥

‘ऊं’ ऐं ह्रीं क्लीं चामुण्डायै विच्चे ऊं शैलपुत्री देव्यै नम:’ का नित्य एक माला जाप करने से हर प्रकार की शुभता प्राप्त होती है। ऐसा माना जाता है कि सच्चे मन से शैलपुत्री की आराधना करने वाले भक्तों की सभी मनोकामनाएं पूरी हो जाती हैं।

मां शैलपुत्री की साधना
साधकों को यह जान लेना भी आवश्यक है कि मां शैलपुत्री कि साधना मनोवांछित लाभ के लिए की जाती है। इनकी साधना का सबसे उत्तम समय सायं पांच बजे से सात बजे के बीच है। मां शैलपुत्री की पूजा श्वे़त पुष्पों से करनी चाहिए और इन्हें मावे से बने भोग लगाने चाहिए। श्रृंगार में मां शैलपुत्री को चंदन अर्पित करना सर्व फलदायक होता है।

पूजा का ज्योतिष दृष्टिकोण

देवी दुर्गा के प्रथम स्वरूप मां शैलपुत्री की साधना का संबंध चंद्रमा से है। कालपुरूष सिद्धांत के अनुसार कुण्डली में चंद्रमा का संबंध चौथे भाव से होता है। अतः मां शैलपुत्री की साधना का संबंध व्यक्ति के सुख, सुविधा, माता, निवास स्थान, पैतृक संपत्ति, वाहन सुख, और चल-अचल संपत्ति से भी है। ज्योतिष शास्त्र के जानकारों के अनुसार जिनकी कुण्डली में चंदमा किसी नीच ग्रह से प्रताड़ित है या चंद्रमा नीच का है। उन्हें मां शैलपुत्री की साधना सर्वश्रेष्ठ फल देती है। मां शैलपुत्री की साधना का संबंध व्यक्ति के मन से भी है। इनकी साधनासे साधक की मनोविकृति दूर होती है।