अज़हर पर प्रतिबंध की हकीकत ?

अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया, यह भारत की कूटनीति विजय है। इसका श्रेय भारत सरकार को जरुर मिलेगा लेकिन यदि हमें इस घोषणा की असलियत का पता चल जाए तो हमारी यह खुशी हवा हो जाएगी।

अज़हर पर प्रतिबंध की हकीकत ?
Azhar Mahmood Banned

पाकिस्तान के आतंकवादी मसूद अजहर को वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया गया है, इस पर हम भारतीयों की प्रसन्नता स्वाभाविक ही है, क्योंकि यह वही अज़हर है, जिसे भारत सरकार ने दो अन्य आतंकवादियों के साथ 1999 में रिहा कर दिया था ताकि हमारे अपहत हवाई जहाज के यात्री कंधार से सुरक्षित वापस लाए जा सकें। इस अजहर को 1994 में कश्मीर में हिंसक गतिविधियां फैलाने के कारण गिरफ्तार किया गया था। रिहाई के बाद अजहर चुप नहीं बैठा। उसने सन 2000 में जैशे-मुहम्मद की स्थापना की और साल भर में ही श्रीनगर में विधानसभा के पास भयंकर विस्फोट कर दिया, जिसमें दर्जनों लोग मारे गए। 2001 में ही उसने भारतीय संसद पर हमला बोला। 2016 में पठानकोट के वायुसेना केंद्र और गत वर्ष पुलवामा-हमले की भी जिम्मेदारी जैशे-मुहम्मद की मानी जाती है।

अजहर के संगठन जैशे-मुहम्मद पर 2002 में पाकिस्तानी सरकार ने प्रतिबंध लगा दिया था। उसने हाफिज सईद तथा अन्य कुछ आतंकवादियों के संगठनों पर भी प्रतिबंध लगा रखे हैं। लेकिन ये प्रतिबंध सिर्फ दिखावे के हैं, हाथी-दांत की तरह। इन प्रतिबंधों के बावजूद ये संगठन बहुत सक्रिय हैं। उन्हें कट्टरपंथियों, फौज और पाकिस्तानी गुप्तचर सेवा का पूर्ण सहयोग प्राप्त रहता है। वे या तो गुपचुप अपना काम करते रहते हैं या फिर नाम बदलकर सरे-आम दहाड़ते रहते हैं। मैंने अपनी पाकिस्तान-यात्राओं के दौरान इन आतंकवादी संगठनों के नेताओं को लाहौर और इस्लामाबाद की सड़कों पर भीड़ जमा करके भाषण देते हुए सुना है। वे जनता से पैसा भी उगाहते हैं। उन्हें पुलिस की सुरक्षा भी मिली होती है। उनके सिर पर 60-70 करोड़ रु. के इनाम भी हैं लेकिन पाकिस्तान में किसकी हिम्मत है कि उनको कोई छू ले।

अजहर को संयुक्त राष्ट्र संघ ने वैश्विक आतंकवादी घोषित कर दिया, यह भारत की कूटनीति विजय है। इसका श्रेय भारत सरकार को जरुर मिलेगा लेकिन यदि हमें इस घोषणा की असलियत का पता चल जाए तो हमारी यह खुशी हवा हो जाएगी। विश्व-आतंकवादी दो-चार या दस-पांच नहीं हैं। संयुक्तराष्ट्र ने अब तक 262 लोगों और 83 गिरोहों को विश्व-आतंकवादी घोषित किया है। इसमें एशिया, अफ्रीका, पश्चिमी एशिया और अमेरिकी महाद्वीप के भी नाम हैं। इस सूची में शामिल होनेवाले लोगों पर तीन तरह के प्रतिबंध लगते हैं। एक तो वे विदेश-यात्रा नहीं कर सकते। दूसरा, उनकी सारी संपत्तियां जब्त कर ली जाती हैं। तीसरा, वे हथियार नहीं रख सकते।

इन तीनों प्रतिबंधों को नाकाम करना कितना आसान है, यह बताने की जरुरत नहीं है। ये प्रतिबंध जरा भी काम के होते तो दुनिया में जिस तेजी से आंकवाद फैल रहा है, क्या वह फैल पाता ? स्वयं संयुक्तराष्ट्र संघ के मुकाबले विश्व-आतंकवाद अधिक प्रभावशाली हो गया है। यूरोप और अमेरिका में इस्लामी आतंकवादियों की जो थोड़ी पिटाई हो गई तो उन्होंने उसका बदला श्रीलंका के ईसाइयों से ले लिया। यदि संयुक्तराष्ट्र संघ इन हिंसक लोगों और गिरोहों के माथे पर सिर्फ विश्वआतंकी का बिल्ला चिपकाने की बजाय उनकी गिरफ्तारी और कड़ी सजा पर जोर देता तो कुछ बात बनती लेकिन वह खुद एक नख-दंतहीन संस्था है। उसने इतना कर दिया, यही काफी है।

भारत पिछले 10 साल से कोशिश कर रहा था कि मसूद अजहर और उसके गिरोह जैशे-मुहम्मद को वह वैश्विक आतंकवादी घोषित करवाए। कांग्रेस सरकार ने संयुक्तराष्ट्र संघ सुरक्षा परिषद के प्रस्ताव न. 1267 के अंतर्गत बनी उस काली सूची में अजहर का नाम जुड़वाने की पूरी कोशिश की लेकिन वह इसलिए असफल होती रही कि चीन हमेशा अड़ंगा लगा देता था। चीन ने चार बार ‘तकनीकी आपत्ति’ लगाकर इस घोषणा को टलवा दिया लेकिन इस बार अमेरिका, ब्रिटेन और फ्रांस ने अंगद का पांव अड़ा दिया। सुरक्षा परिषद के इन तीनों सदस्यों ने मिलकर अजहर के मामले को उस कमेटी के दायरे से बाहर निकालकर सुरक्षा परिषद में खुली बहस के लिए पेश करने की धमकी दे दी। यदि यह मामला सुरक्षा परिषद में आ जाता तो चीन की बहुत बदनामी होती। इंडोनेशिया- जैसे दुनिया के सबसे बड़े मुस्लिम देश भारत के पक्ष में हो और चीन विपक्ष में होता तो क्या होता ? इसके अलावा आजकल डोनाल्ड ट्रंप प्रशासन हाथ धोकर पाकिस्तानी आतंकवाद के पीछे पड़ा हुआ है और चीन पर उसका गहरा व्यापारिक दबाव भी है। अमेरिकी नीति-निर्माताओं को पता है कि अफगानिस्तान के तालिबान नेताओं के साथ भी अजहर की गहरी सांठ-गांठ थी। अमेरिकी फौज पर हमले करवाने में अजहर ने उसामा बिन लादेन का जमकर साथ दिया था। अब जबकि अमेरिका अफगानिस्तान से अपना पिंड छुड़ाना चाहता है, वह पाकिस्तान के तालिबान-समर्थकों को जड़-मूल से उखाड़ना चाहता है।

चीन ने काफी आनाकानी के बावजूद अंतरराष्ट्रीय दबाव के आगे घुटने टेक दिए हैं लेकिन पाकिस्तान के साथ उसकी ‘लौह-मैत्री’ में कोई फर्क नहीं पड़ा है। पाकिस्तान ने अजहर पर घोषित प्रतिबंधों को तुरंत लागू करने का वादा किया है लेकिन उसने भारत को आगाह किया है कि वह इस घोषणा से फूलकर कुप्पा न हो जाए, क्योंकि इसमें कश्मीर और पुलवामा हमले का जिक्र नहीं है। इस बात को कांग्रेस पार्टी दोहरा रही है और वह यह भी कह रही है कि यदि अटलजी की सरकार अजहर को 1999 में रिहा नहीं करती तो संसद और पुलवामा पर हमला होता ही क्यों ? यहां पूछा जा सकता है कि हमारे जहाज में बैठे डेढ़ सौ लोग मारे जाते तो क्या वह ठीक होता ? कांग्रेस की यह मांग ठीक है कि भारत अजहर की गिरफ्तारी और सजा पर जोर दे। लेकिन उसने इस मामले को भी चुनावी राजनीति में घसीटा तो अब नरेंद्र मोदी इसका श्रेय ले तो यह नहले पर दहला ही है। इस मामले में सबसे सधी हुई प्रतिक्रिया सपा नेता अखिलेश यादव की है, जिन्होंने भारतीय विदेश मंत्रालय के कूटनीतिज्ञों की तारीफ की है। इसमें शक नहीं कि विदेश सचिव गोखले ने चीन, अमेरिका और रुस आदि देशों में जाकर अथक प्रयत्न किया है। इस सफलता से आतंकवाद पर कोई रोक लगनेवाली नहीं है लेकिन इससे यह तो सिद्ध होता है कि कोशिश की जाए और परिस्थितियां साथ दें तो लोहे को भी पिघलाया जा सकता है।

चीन ने अजहर को विश्व-आतंकवादियों की सूची में डलवाते वक्त भारत से यह आशा भी की है कि वह पाकिस्तान से संवाद शुरु करे। इसमें शक नहीं है कि इस समय चीन के साथ भारत का जैसा सीधा संवाद है, वैसा 1962 के बाद कभी नहीं रहा लेकिन खुद चीन अपने सिंक्यांग प्रांत में उइगर मुसलमानों के आंतकवाद से परेशान है। पाकिस्तान और अफगानिस्तान में दनदना रहे आतंकवाद को काबू करने में चीन का प्रभाव भारत और अमेरिका से कहीं ज्यादा सार्थक हो सकता है। अजहर का यह मामला चीन को एक नई पहल का इशारा दे रहा है।


(लेखक, भारतीय विदेश नीति परिषद के अध्यक्ष हैं)